​ट्रिपल तलाक :- एक क्रिमिनल अफेन्स और दोगलापन!

ट्रिपल तलाक पर जब उच्चतम न्यायालय ने ऐतिहासिक फुर्ती दिखाते हुए अवैध घोषित किया और केन्द्र सरकार को इसे रोकने के लिए कानून बनाने का जब सुझाव दिया तो कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बिना विलम्ब किए प्रतिक्रिया दी कि किसी नये कानून की आवश्यकता नहीं है , इसे रोकने के लिए पहले से ही कानून उपलब्ध है।

फिर गोट्टीबाजी हुई और ट्रिपल तलाक को क्रिमिनल अफेन्स मान कर बिल बनाया गया और आज लोकसभा में पेश कर दिया गया।
यह सरकार का दोगला रवैया है जो पहले कुछ कहती है फिर पलट कर उसके विरुद्ध कार्य करने लगती है।
महत्वपुर्ण प्रश्न यह है कि ट्रिपल तलाक के विरुद्ध जब कोई
था तो फिर उच्चतम न्यायालय ने इसे अवैध किस कानून के तहत किया ?
शरियत में ट्रिपल तलाक को “बिद्दत” कहा गया है और इ
कहा गया है , संविधान में शरियत के कानून को ही मुस्लिम पर्सनल लाॅ के तौर पर मान्यता दी गयी है तो यह तो ट्रिपल तलाक के विरुद्ध ही कानून हुआ  फिर नये क्रिमिनल कानून की आवश्यकता
r> आवश्यकता यूं कि एक टीस जो पिछले 70 सालों से संघ और इनके ज़हरीले लोगों के बीच है कि मुसलमानों के पर्सनल लाॅ में आजतक बदलाव ना होना , जबकि शाहबानो प्रकरण में उच्चतम न्यायालय एक बार ऐसा प्रयास कर चुका है परन्तु राजीव गाँधी ने कानून बनाकर उच्चतम न्यायालय का वह फैसला पलट दिया।
यह सरकार ट्रिपल तलाक पर कानून बनाकर शरियत और मुस्लिम पर्सनल लाॅ में वही दखल देना चाहती है और अपनी टीस को मिटाना चाहती है।
मोदी सरकार को ना तो किसी मुस्लिम महिला से मतलब है ना हिन्दू महिला से , वह तो बस अपने कट्टर समर्थकों को सरकार के बहुमत के ज़ोर पर मुसलमानों के मामले में ज़बरदस्ती कानून बना कर दिखाना चाहती है कि वह इनके इस अधिकार को छीन रही है।

इसी सरकार के दिए आँकड़ों के अनुसार पिछले वर्ष देश में ट्रिपल तलाक के कुल 57 मामले सामने आए हैं उसके लिए यह सरकार यदि कानून बना रही है तो मंशा
स्पष्ट है जो ऊपर बताया गया है।
2011 के सेंसेक्स के अनुसार इस देश में बिना तलाक दिए छोड़ दी पत्नियों की संख्या 22 लाख हैं जिनमें एक पत्नी देश के प्रधानमंत्री मोदी जी की पत्नी जशोदाबेन भी हैं , सरकार एक वर्ष में मात्र 57 केस के लिए क्रिमिनल अफेन्स का कानून बना रही है तो इन 22 लाख लोगों के लिए कौन सा कानून बनना चाहिए यह सवाल कौन पूछेगा ? सभी धर्म के लोग विवाह अपने धर्म के अनुसार ही करते हैं और अपना वैवाहिक जीवन अपने धर्म के अनुसार ही निभाते हैं , केवल इस्लाम में वैवाहिक जीवन में कटुता आने और आगे संबन्ध ना चलने पर आसानी से अलगाव की चरणबद्ध व्यवस्था है , सनातन , ईसाई , सिख , जैन अथवा बौद्ध में एक बार वैवाहिक जीवन में बध जाने के बाद उससे अलगाव की कोई धार्मिक व्यवस्

r>सनातन धर्म में तो अग्नि को साक्षी मानकर जो 7 फेरे वर-वधु लेते हैं वह सात जन्मों के संबन्ध के लिए होते हैं , यह सनातन धर्म की सात जन्मों के लिए वैवाहिक बंधन है जो अक्सर ही नहीं बल्कि भारत में 8•7% हिन्दू लोग इसी जीवन में मारपीट लड़ाई , कुलटा कुलक्षिणी जैसा जूतमपैजार करके कोर्ट से अलग हो जाते हैं।

“तलाक ए बिद्दत” करने वाले एक वर्ष में मात्र 57 लोग यदि अपने धर्म को सही से ना निभा पाए और इस कारण यह संसद क्रिमिनल अफेन्स का कानून बना रही है तो कोई यह सवाल पूछेगा कि सनातन धर्म के सात जन्मों के वैवाहिक संबन्ध को इसी जीवन में तोड़ने वावे
हिन्दू लोगपना धर्म नहीं मान रहे हैं उनके लिए कौन सा क्रिमिनल कानून बनेगा ?कोई कानून नहीं बनेगा , यहाँ बस जबरपेलई होगी , जिसकी लाठी उसकी भैंस।उदाहरण देखिए कानून की “माँ की साकी नाका” कायह कौन सा कानून है कि 16108 बच्चियों से संभोग को  टारगेट बनाकर प्रतिदिन 10 बच्चियों से बलात्कार के लिए आश्रम चलाने वाले बाबा दीक्षित को पुलिस अभी तक गिरफ्तार नहीं कर पाई और अदालत उसे 4 जनवरी को पेश होने का सम्मानजनक फैसला सुना रही है ?


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